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काल सर्प योग के  प्रकार 

[महापद्य कालसर्प योग:]

जब राहु षष्ठ भाव में और केतु द्वादश भाव में हो तथा इनके बीच बाकी ग्रह हों तो ‘महापद्य कालसर्प योग’ की सृष्टि होती है (कुंडली संख्या-17)। इस कुंडली में द्वितीय भाव मंगल, शनि और सूर्य के मध्य होकर पापकर्तरी योग बना रहा है। सूर्य पर शनि की दृष्टि है। शुक्र पर मंगल की दृष्टि है। दशमेश अपने से अष्टम है। सप्तम भाव पर शनि की नीच दृष्टि है। बुध भाग्य भाव से षड़ाष्टक कर रहा है। धनेश मंगल अपने से द्वादश है। गुरु अपनी नीच राशि में है तथा उसकी राशि मीन में राहु है। ऐसी स्थिति में जातक को निम्नवत फल प्राप्त होंगे-

  • प्रेम प्रकरण असफल होता है। गृहस्थ सुख न्यूनतम रहता है।

  • पत्नी का विरह सहन करना पड़ता है या पत्नी मनोनुकूल नहीं मिलती।

  • आयु पर्यन्त रोग, शोक, कष्ट तथा शत्रुओं से घिरा रहता है।

  • चरित्र पर बार-बार छींटे लगते हैं। उसका चरित्र शुद्ध नहीं रहता।

  • निराशा की भावना से ग्रस्त रहता है।

  • वृद्धावस्था कष्टप्रद एवं रोगदायक रहती है।

  • आय में न्यूनता, धर्म क्षति एवं व्यय की बहुलता रहती है।

[शंखनाद कालसर्प योग:]

- जब राहु नवम् भाव में और केतु तृतीय भाव में हो तथा अन्य ग्रह इनके मध्य में हों तो ‘शंखनाद कालसर्प योग’ बनता है (कुंडली संख्या-18)। इस कुण्डली में जहां पंचमेश राहु के साथ भाग्य स्थान पर ग्रहण योग बना रहा है, वहीं भाग्येश षष्ठ भाव में शनि द्वारा दृष्ट है। जातक का जन्म साढ़ेसाती में हुआ है। राहु पर गुरु की दृष्टि तथा लाभ भाव में गुरु की नीच दृष्टि है। धन, धान्य एवं ऐश्वर्य कारक शुक्र अपनी नीच राशि में है। अष्टमेश अष्टम से द्वादश है। दशमेश का दशम भाव से षड़ाष्टक है। लग्न पर बुध की नीच दृष्टि है। शनि, राहु और चन्द्र मंगल द्वारा दृष्ट हैं। ऐसी स्थिति में जातक को निम्नवत फल प्राप्त होंगे-

  • वह भाग्यहीन, दुर्भाग्यशाली तथा हीन भाग्य वाला होता है।

  • राज्य पक्ष से प्रतिकूलता, अपमान तथा अवनति की संभावना रहती है।

  • पितृ-सुख तथा व्यापार-व्यवसाय में न्यूनता रहती है। कम लाभ तथा हानि बार-बार होती है। अथक परिश्रम करने पर भी व्यवसाय की स्थिति नहीं सुधरती।

  • गृहस्थ सुख में बाधा एवं भोग से अतृप्ति रहती है।

[तक्षक कालसर्प योग:]

-जब राहु सप्तम भाव में और केतु लग्न में हो तथा इनके बीच अन्य सभी ग्रह हों तो ‘तक्षक कालसर्प योग’ होता है (कुंडली संख्या-19)। इस कुंडली में गुरु-राहु युति चांडाल योग बना रहा है तथा दशमेश गुरु अपनी राशि से षड़ाष्टक कर रहा है। सूर्य का स्वराशि सिंह से द्वि-द्वादश योग है। लाभेश मंगल का लाभ भाव से षड़ाष्टक है। लग्नेश बुध का अपनी कारक राशि कन्या से द्वि-द्वादश योग है। शनि अपने प्रबल शत्रु सूर्य की सिंह राशि में है जबकि अष्टमेश षड़ाष्टक योग बना रहा है। पंचम भाव में स्त्री ग्रह शुक्र तथा बुध है। सप्तम भाव पर मंगल की दृष्टि है। शुक्र अपनी राशि से षड़ाष्टक कर रहा है। सप्तम भाव पर राहु, केतु, गुरु एवं मंगल का दुष्प्रभाव है। ऐसी स्थिति में जातक को निम्नवत फल प्राप्त होंगे-

  • पुत्र का अभाव रहता है तथा कन्या से मानसिकता नहीं जुड़ती।

  • स्त्री सुख में न्यूनता रहती है। वह परस्त्रीगामी हो सकता है।

  • जीवन में भारी उथल-पुथल एवं संघर्ष रहता है।

  • पैतृक संपत्ति दान दे देता है अथवा नष्ट हो जाती है।

  • जीवन में कई बार जेल-यात्रा करनी पड़ती है।

  • गुप्तांग संबंधी रोग जीवन भर परेशान करते हैं।

  • शत्रु पक्ष प्रबल बना रहता है।

[अनंत कालसर्प योगः]

-जब लग्न में राहु एवं सप्तम भाव में केतु हो और शेष ग्रह इनके मध्य अवस्थित हो तो ‘अनंत कालसर्प योग’ होता है (कुंडली संख्या-20)। इस कुंडली में लग्नस्थ मंगल राहु के साथ एवं चन्द्र केतु के साथ है। चंद्र और मंगल का अपनी राशि से द्वि-द्वादश योग है। धन भाव पर गुरु की नीच दृष्टि एवं द्वादश भाव पर गुरु की दृष्टि है। चंद्र-केतु ग्रहण योग बना रहे हैं। जहां सूर्य का स्वराशि से द्वि-द्वादश योग है, वहीं शुक्र षड़ाष्टक कर रहा है। पंचम भाव पर शनि की नीच दृष्टि है। जातक प्राकृतिक लग्न, सूर्य लग्न तथा चंद्र लग्न-तीनों से मांगलिक है। मंगल पर शनि की दृष्टि भी है। गुरु भी शनि द्वारा दृष्ट है। ऐसी स्थिति में जातक को निम्नवत फल प्राप्त होंगे-

  • जीवन में कभी मानसिक शांति नहीं मिलती। वह सदैव अशान्त, क्षुब्ध, परेशान तथा अस्थिर रहता है।

  • वह नीच बुद्धि, दुर्बद्धि, कपटी, चालबाज, लुच्चा, असत्य भाषणकर्ता, प्रपंची, झूठ तथा षड़यंत्रों में फंसने वाला होता है।

  • जीवनभर थानों तथा कोर्ट-कचहरियों के चक्कर काटता रहता है।

  • बार-बार उलट-पलटकर व्यवसाय करता है और हानि उठाता है।

  • पद-प्रतिष्ठा के लिए आवश्यकता से अधिक संघर्ष करना पड़ता है।

  • गृहस्थ जीवन शून्यवत रहता है।

[शंखपाल कालसर्प योग:]

-जब राहु चतुर्थ भाव में तथा केतु दशम भाव में हो और अन्यान्य ग्रह इनके मध्य हों तो ‘शंखपाल कालसर्प योग’ होता है (कुंडली संख्या-21)। इस कुंडली में लग्नेश गुरु द्वादश भाव के स्वामी मंगल तथा केतु के साथ दशम भाव में है। राहु भाग्येश सूर्य और द्वितीयेश शनि द्वारा दृष्ट है। सप्तमेश बुध द्वादश भाव में है। भाग्येश का अपनी राशि से षड़ाष्टक है। राहु और शनि शत्रु राशि में हैं। चन्द्र षड़ाष्टक में है एवं शनि मंगल द्वारा दृष्ट है। ऐसी स्थिति में जातक को निम्नवत फल प्राप्त होते हैं-

  • धन-धान्य, सुख-समृद्धि तथा चल-अचल संपत्ति में न्यूनता आती है। पैतृक संपत्ति प्राप्तद करने में व्यवधान उपस्थित होते हैं।

  • प्रायः भाई, बहन, माता तथा नौकर-चाकरों द्वारा व्यवधान, परेशानी और बाधाएं आती रहती हैं।

  • नौकरी एवं व्यवसाय में उतार-चढ़ाव का सामना करना पड़ता है।

  • स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है।

  • शिक्षा प्राप्ति में बाधाएं आती हैं एवं शिक्षा पूर्ण नहीं होती।

[पातक कालसर्प योग:]

-जब राहु दशम भाव में और केतु चतुर्थ भाव में हो तथा अन्य ग्रह इनके मध्य हों तो ‘पातक कालसर्प योग’ होता है (कुंडली संख्या-22)। इस कुंडली में लाभेश शुक्र नीचाभिलाषी तथा षष्ठेश है। धन भाव पर गुरु अर्थात् लग्नेश-सुखेश की नीच दृष्टि है। शनि अपने प्रबल शत्रु सूर्य-भाग्येश के साथ सप्तम भाव में है। द्वादशेश मंगल शत्रु शनि द्वारा दृष्ट है। बुध दशम भावाधिपति होकर षड़ाष्टक कर रहा है। गुरु पापकर्तरी योग के अन्तर्गत सूर्य, शनि तथा मंगल के मध्य है। चंद्र अष्टमेश होकर षष्ठ भाव में है। ऐसी स्थिति में जातक को निम्नवत फल प्राप्त होते हैं-

  • सम्पूर्ण जीवन बाधक रहता है। अथक प्रयास करने पर भी नौकरी-व्यवसाय संबंधी सफलता नहीं मिलती। भटकाव बना रहता है।

  • व्यापार में कदम-कदम पर मित्रों द्वारा धोखा देने से धन हानि होती है।

  • संतान निरन्तर रोगग्रस्त रहती है।

  • नाना-नानी अथवा दादा-दादी का वियोग सहना पड़ता है।

  • माता-पिता का विरहजन्य कष्ट भोगना पड़ता है।

[शेषनाग कालसर्प योगः]

- जब राहु बारहवें भाव में एवं केतु षष्ठ भाव में हो तथा अन्य सभी ग्रह इनके मध्य हों तो ‘शेषनाग कालसर्प योग’ होता है (कुंडली संख्या-23)। इस कुंडली में राहु द्वादश भाव में चन्द्र ग्रहण योग बना रहा है। जातक का जन्म शनि की साढ़ेसाती में हुआ है। शनि, चंद्र तथा राहु पर मंगल की दृष्टि है। लाभेश अपनी नीच राशि में है जबकि लग्नेश गुरु का लग्न से षड़ाष्टक है। ऐसी स्थिति में जातक को निम्नवत फल प्राप्त होते हैं-

  • शरीर सुख न्यूनतम रहता है। स्वास्थ्य प्रायः बिगड़ा रहता है।

  • लड़ाई-झगड़े तथा कोर्ट-कचहरी में हार होती है।

  • गुप्त शत्रुओं से पीडि़त रहता है।

  • कदम-कदम पर अपनों से बदनाम होता है। मृत्योपरान्त नाम होता है।

  • बाईं आंख का आॅपरेशन होता है।

[ विषाक्त कालसर्प योग:]

जब राहु एकादश भाव में और केतु पंचम भाव में हो तथा शेष ग्रह इनके मध्य हों तो ‘विषाक्त कालसर्प योग’ होता है (कुंडली संख्या-24)। इस कुंडली में लग्नेश उच्च राशिस्थ होकर द्वादश भाव पर नीच दृष्टि डाल रहा है। लाभ भावस्थ राहु अष्टम भाव में शनि के साथ है। धनेश मंगल अपनी नीच राशि में सप्तमेश होकर दशम भाव में शनि द्वारा दृष्ट है। दशमेश का सप्तमेश से परस्पर संबंध है। पराक्रमेश गुरु पराक्र भाव से दृष्ट है। ऐसी स्थिति में जातक को निम्नवत फल प्राप्त होते हैं-

  • आजीविका के लिए घर-परिवार से दूर रहना पड़ता है।

  • भाइयों से विवाद तथा कोर्ट-कचहरी का सामना करना पड़ता है।

  • वह प्रायः नैत्र रोग, हृदय रोग तथा अनिद्रा आदि से पीडि़त रहता है। इसस उसका शरीर जर्जर हो जाता है।

  • जीवन की इहलीला रहस्यमय तरीके से समाप्त होती है।

         
 
 

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